10 साल जेल में काटने के बाद महिला हेरोइन रखने के आरोप से बरी

नई दिल्ली। हेरोइन रखने की आरोपी एक महिला को 10 साल जेल काटने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने बरी कर दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले से न्याय व्यवस्था की सुस्त चाल पर फिर नजर जाती है। ऐनाबेले अनालिस्टा मलिबागो नाम की इस विदेशी महिला को ट्रायल कोर्ट से 10 साल की सजा सुनाई गई थी, जिसे चुनौती देते हुए उन्होंने 2014 में हाई कोर्ट में अपील की थी। अब हाई कोर्ट के फैसले से उन्हें जो राहत मिली है, वह कोई मायने नहीं रखती। बस इतनी राहत है कि वह बरी हो गई हैं।
इतने साल बाद बरी किए जाने के फैसले से न्याय व्यवस्था की धीमी चाल पर चिंता जरूर होती है, जिसके कारण कई बार कई निर्दोषों और विचाराधीन कैदियों को सालों जेल में गुजारने पड़ जाते हैं। इस मामले में अभियोजन पक्ष ने कहा कि ऐनाबेले को 15 अक्टूबर 2008 को अरेस्ट किया गया था। ऐनाबेले को स्पाइसजेट के चेक-इन काउंटर पर डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू (DRI) ने हेरोइन के साथ अरेस्ट किया था। आरोप था कि उनके ट्रॉली बैग से 1.24 किलोग्राम हेरोइन मिली थी। टेस्ट के बाद पता चला था कि बरामद पाउडर हेरोइन था, जो 35.6 फीसदी शुद्ध था। अरेस्ट के बाद ऐनाबेले का लंबा ट्रायल चला और साल 2014 में उन्हें दोषी करार देते हुए 10 साल की सजा सुनाई गई। ट्रायल चलने तक महिला पहले ही 5 साल 5 महीने की सजा काट चुकी थीं।
इसके बाद ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील की गई औ र उसका फैसला आने में 4 साल से ज्यादा का वक्त लग गया। महिला के वकील ने हाई कोर्ट में कहा कि पूरा केस इसी बात से विकृत हो जाता है कि शिकायतकर्ता केस की आईओ यानी जांच अधिकारी थीं। आईओ ने ही लिखित शिकायत दाखिल की थी, जिसके आधार पर ऐनाबेले के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई।
जस्टिस सी हरि शंकर ने इसी आधार पर दोषी करार दिए जाने के फैसले को पलट दिया और ऐनाबेले को बरी कर दिया। जस्टिस हरि शंकर ने कहा कि जांच हमेशा निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर सहमति जताई कि केस रजिस्टर करने वाला और आरोप लगाने वाली पुलिस अधिकारी खुद केस का जांच अधिकारी नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता है तो केस की जांच निष्पक्षता पर गंभर सवाल उठने स्वाभाविक हो जाते हैं।
-एजेंसियां

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