एक शोध पत्र के मुताबिक, PCC बनाती है नरेन्‍द्र मोदी को अपराजेय

विशाल जनसैलाब, उत्‍साह से लबरेज कार्यकर्ता और मोदी-मोदी के नारे….कुछ ऐसा नजारा 16 सितंबर 2013 से लेकर अब तक भारत ही नहीं पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है।
पिछले 6 वर्षों में पीएम नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी हो या अमेरिका का मेडिसन स्‍क्‍वायर, हर जगह ‘ब्रैंड मोदी’ धमक सुनाई दी है।
आलम यह है कि पहली बार अमेरिकी राष्‍ट्रपति डॉनल्‍ड ट्रंप भी जल्‍द ही ‘हाउडी मोदी’ कहते नजर आएंगे।
आइए जानते हैं कि कैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का ‘प्रधान सेवक’ आज भी अपराजेय है…।
अहमदाबाद स्थित प्रतिष्ठित मुद्रा इंस्‍टीट्यूट ऑफ कम्‍युनिकेशन में पेश किए गए एक शोध पत्र के मुताबिक पीएम मोदी की सफलता के पीछे PCC है। PCC यानि परसेप्‍शन, कम्‍युनिकेशन और कनेक्‍शन। शोध पत्र में कहा गया है कि पीएम मोदी में ऐसी विलक्षण बाते हैं जो उन्‍हें अपने विरोधियों के सामने अपराजेय बनाती हैं। इसमें सबसे पहले शब्‍द आता है ‘परसेप्‍शन यानि धारणा।’
‘लोगों के साथ सीधा कनेक्‍शन दिलाता है सफलता’
पीएम मोदी पर लोगों में काफी भरोसा है। इसी वजह से प्रधानमंत्री मोदी मतदाताओं की भाषा में उनसे सीधा संवाद (कम्‍युनिकेशन) करते हैं और लोगों के साथ उनका यह ‘कनेक्‍शन’ ही उन्‍हें सफलता दिलाता है।
मार्केटिंग के विशेषज्ञ फिलिप कोटलर का मानना है कि ब्रैंडिंग किसी प्रोडक्‍ट को ब्रांड की ताकत देना है जिसमें नाम, डिजाइन या विशिष्‍ट विशेषता देना है जो उसे दूसरों से अलग करती है।
मुद्रा इंस्‍टीट्यूट ऑफ कम्‍युनिकेशन की प्रोफेसर वर्षा जैन और गणेश बीई ने अपने शोध पत्र में कहा कि राजनीतिक क्षेत्र में भी ब्रैंडिंग के कुछ सिद्धांत नेताओं और राजनीतिक दलों पर भी लागू होते हैं।
उन्‍होंने कहा कि सोशल मीडिया के जरिए जनता के साथ नेताओं का सीधा संवाद करना पूरी दुनिया में हो रहा है और यह काफी महत्‍वपूर्ण है। हालांकि राजनीतिक मार्केटिंग का यह भारतीय मॉडल पश्चिमी दुनिया से अलग है।
पश्चिमी देश जानना चाहते हैं मोदी की सफलता का राज
प्रफेसर वर्षा जैन ने कहा, ‘अमेरिका और यूरोपीय देशों में कई अध्‍ययन इस बारे में हुए हैं कि किस तरह से राजनेता संवाद करते हैं और कैसे उनकी छवि बनाई जाती है। हालांकि भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित मॉडल पर अभी कुछ खास अध्‍ययन नहीं हुआ है। ऐसा तब है जब पश्चिमी दुनिया में यह जानने की उत्‍सुकता है कि मोदी की राजनीतिक छवि क्‍या है।’
अपने शोध पत्र में दोनों ही लेखकों ने पूर्व अमेरिकी राष्‍ट्रपति एफडी रुजवेल्‍ट का उदाहरण दिया जिन्‍होंने कम्‍युनिकेशन का इस्‍तेमाल करके मतदाताओं के मुद्दों को प्राथमिकता दी और उनका भरोसा जीता। लेखकों ने पश्चिमी जर्मनी की पहली महिला चांसलर कोनराड अडेनयूर का भी उदाहरण दिया है। द्वितीय विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के बाद कोनराड बहुत आसानी से लोगों से जुड़ गईं।
‘पर्सनल कनेक्‍ट’ चाहते हैं भारत के वोटर
प्रोफेसर वर्षा जैन ने कहा कि अगर हम नेतृत्‍व के भारतीय मॉडल को पश्चिमी दुनिया से तुलना करें तो भारत के लोग अपने नेता से ‘पर्सनल कनेक्‍ट’ चाहते हैं। उन्‍होंने कहा, ‘अगर कोई वर्ष 2014 के पीएम मोदी के चुनाव प्रचार रणनीति का विश्‍लेषण करे तो सोशल मीडिया ने उनकी काफी मदद की। मोदी ने लगातार कई रैलियों को संबोधित किया और वर्चुअल मीटिंग के जरिए मतदाताओं के साथ संवाद किया। यहां तक कि मोदी कुर्ता ने उन्‍हें वोटरों से जोड़ने में मदद की।’
बता दें कि 16 सितंबर 2013 को पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी उम्मीदवार चुने जाने के बाद हरियाणा के रेवाड़ी में अपनी पहली रैली को संबोधित किया था। मोदी यहां पूर्व सैन्यकर्मियों की एक रैली को संबोधित करने पहुंचे थे। इस पहली रैली में मोदी जैसे ही मंच से भाषण देने के लिए उठे वहां मौजूद करीब डेढ़ लाख लोगों ने तालियों की जोरदार गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया था। इसके बाद पीएम मोदी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और वर्ष 2019 में दूसरी बार शानदार बहुमत के साथ देश के प्रधानमंत्री बने।
-एजेंसियां

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