Abid Surti की ‘सूफी- द इनविजिबल मैन ऑफ द अंडरवर्ल्ड’

मुंबई। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त लेखक Abid Surti की पुस्तक, “सूफी – द इनविजिबल मैन ऑफ द अंडरवर्ल्ड” के नये खंड का अनावरण प्रसिद्ध निर्देशक श्रीराम राघवन के हाथों बांद्रा के टाईटलवेव्हस में किया गया। इस अवसर पर श्रीधर राघवन, ऐनी जैदी, राजश्री देशपांडे, अभिनेता गुरमीत चौधरी, अतुल कसबेकर भी उपस्थित थे।

Abid Surti का जन्म: 5 मई, 1935 को हुआ था।  एक राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता हिन्दी-गुजराती साहित्यकार और कार्टून पात्र ‘ढब्बू जी’ के सर्जक हैं। आबिद सुरती चित्रकार, कार्टूनिस्ट, व्यंग्यकार, उपन्यासकार और कहानीकार भी हैं। विभिन्न कलाविधाएँ उनके लिए कला और ज़िन्दगी के ढर्रे को तोड़ने का माध्यम हैं। उनकी ये कोशिशें उनके चित्रों में नज़र आती हैं। स्वभाव से यथार्थवादी होते हुए भी वे अपनी कहानियों में मानव-मन की उड़ानों को शब्दांकित करते हैं। जीवन का सच्चाई से वे सीधे साक्षात्कार न करके फंतासी और काल्पनिकता का सहारा लेते हैं। व्यंग्य का पैनापन इसी से आता है, क्योंकि यथार्थ से फंतासी की टकराहट से जो तल्ख़ी पैदा होती है, उसका प्रभाव सपाट सच्चाई के प्रभाव से कहीं ज्यादा तीखा होता है। एक सचेत-सजग कलाकार की तरह आबिद अपनी कहानियों में सदियों से चली आ रही जड़-रूढ़ियों, परंपराओं और ज़िंदगी की कीमतों पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाते हैं और उन्हें तोड़ने के लिए भरपूर वार भी करते हैं। यह बात उन्हें कलाकारों की पंक्ति में ला खड़ा करती है, जो कला को महज़ कला नहीं, ज़िन्दगी की बेहतरी के माध्यम के रूप में जानते हैं। विचार और रोचकता का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण बहुत कम रचनाकारों में नजर आता है, वे प्रथम पंक्ति के रचनाकार हैं।[1]78 साल की उम्र में भी बेहद सक्रिय और महाराष्ट्र में पानी की एक-एक बूँद बचाते हुये लोगों को जल संरक्षण के लिये सजग भी कर रहे हैं।
वह मुंबई महानगर में अब तक लाखों लीटर पानी नष्ट होने से बचा चुके हैं।

पहली बार देश ही नहीं, पूरी दुनिया में सुरती जी की ख्याति कार्टून पात्र ‘ढब्बू जी’ से फैली। स्वभाव से यथार्थवादी होते हुए भी सुरती फंतासी और काल्पनिकता के माध्य से जिंदगी के तमाम तरह के सच का सामना करते हैं। वह अस्सी साल से अधिक के हो चुके हैं लेकिन मुंबई महानगर में वह अपनी ‘पानी बचाओ’ मुहिम के लिए खासे चर्चित हो गए हैं। इसके लिए उनको ‘योगदान’ की ओर से सम्मानित भी किया जा चुका है।

प्रतिष्ठित कथाकार आर.के. पालीवाल कहते हैं कि आबिद सुरती एक ऐसे विरल कथाकार और कलाकार हैं, जो अपनी कलम से हिन्दी और गुजराती साहित्य को पिछले कई दशकों से निरंतर समृद्ध कर रहे हैं। वह फिल्म लेखन के साथ ग़ज़लें भी लिखते हैं। एक सचेत-सजग कलाकार की तरह आबिद अपनी कहानियों में सदियों से चली आ रही जड़-रूढ़ियों, परंपराओं पर जमकर प्रहार करते हैं। वह कला को महज़ कला नहीं, ज़िन्दगी की बेहतरी का सबसे सशक्त माध्यम मानते हैं। वह आज भी महाराष्ट्र में पानी की एक-एक बूँद बचाने के लिए लगातार जन जागरण में जुटे हुए हैं।

हर रविवार को वह आज भी मुंबई महानगर के मीरा रोड इलाके में एक प्लंबर के साथ घर-घर घूमकर लीक हो रहे नलों की टोंटियां ठीक करना नहीं भूलते हैं। इस काम में हर सप्ताह उनके करीब छह-सात सौ रुपए खर्च हो जाते हैं। इस काम के लिए उन्होंने सुनियोजित तरीके से ‘ड्रॉप डेड’ एनजीओ बना रखा है। इस काम में उनका सिर्फ दो लोग साथ देते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने अभी तक करीब 55 लाख लीटर पानी बर्बाद होने से रोका है।

वह बताते हैं कि उनका बचपन पानी की किल्लत के बीच गुजरा। सन् 2007 में वह अपने दोस्त के घर बैठे थे कि उनकी नजर अचानक एक लीक करते पानी के टैप पर पड़ी। जब उन्होंने इस ओर अपने दोस्त का ध्यान दिलाया, तो आम लोगों की तरह ही उसने इस बात को कोई खास तवज्जो नहीं दी। इस बीच उन्होंने कोई आर्टिकल पढ़ा, जिसके मुताबिक अगर एक बूंद पानी हर सेकंड बर्बाद होता है, तो हर महीने क़रीब एक हजार लीटर पानी बर्बाद हो जाता है। यहीं से शुरुआत हुई एक नई क्रान्ति की।
पहली दिक्कत आई प्रॉजेक्ट को शुरू करने के लिए पैसों की, लेकिन इसी दौरान उन्हें हिंदी-साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश की ओर से एक लाख रुपए का पुरस्कार मिल गया। आबिद सुरती कहते हैं, ‘मैं पानी की अहमियत अच्छे से समझता हूं, मैंने अपने जीवन में काफी समय फुटपाथ पर भी गुज़ारा है और लोगों को पानी के लिए तरसते देखा है। मैंने 2007 में अभियान ‘द ड्राप डेड फाउंडेशन’ की शुरूआत की। उस समय चार सौ से ज़्यादा ऐसे नल थे जिनसे पानी टपक रहा था, लोगों को अंदाज़ा भी नहीं होता की बूंद-बूंद से कितना पानी बह जाता है। इन सभी नलों को मैंने ठीक करना शुरू किया और अंदाज़न 4 लाख़ लीटर से भी ज़्यादा पानी बचा लिया।’
– Legend News

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