केडी हास्पीटल में जन्मजात मोतियाबिंद से त्रस्‍त बच्‍चे का operation

बच्चे के 3 साल की उम्र पूरा होने से ही पूर्व केडी हास्पीटल के नेत्र रोग विभाग में operation और इलाज के बारे में लें सलाह

मथुरा। क्या आपका लाडला खिलौना देखकर पकड नहीं पाता है ! क्या वह दौडते-दौडते सामान्यतया वस्तुओं से टकरा जाता है। क्या आपका बच्चा तिरछा या टेडा देखता है। क्या आपके लाडले बच्चे की आंखें स्थिर नहीं रह पाती हैं। क्या आपके बच्चे की आंखों में सफेदी सी दिखाई देती है। यदि इनमें से कोई भी लक्षण आपके लाडले में दिखाई दे रही है, तो आपके बच्चे को भी मास्टर जय की तरह से जन्मजात मोतिया बिंद होने की प्रबल संभावना है।

हरियाणा निवासी हेमंत बघेल के पुत्र को दिखाई नहीं देता था , अब operation के बाद बच्चा सुरक्षित दौडने और खेलने में हुआ सक्षम

आप चिंता करने के बजाय बच्चे के अंदर इन लक्षणों के दिखते ही किसी चिकित्सक को दिखाये। तीन साल की उम्र पूरा होने का इंतजार करने के बजाय मल्टी स्पेशियेलिटी केडी हास्पीटल के नेत्र रोग विभाग में operation और इलाज के बारे में सलाह लंे। इससे आपका बच्चा भी आजीवन अंधता के दंश से बचकर मास्टर जय की तरह से सामान्य जीवन जी सकेगा।

मल्टी स्पेशियेलिटी केडी हास्पीटल में हरियाणा के पलवल, राजीव नगर निवासी हेमंत बघेल ने बताया कि उनके तीन वर्षीय बच्चे मास्टर जय को जन्मजात मोतिया बिंद चिकित्सकों ने बताया था। जय अक्सर खिलौने नहीं ढूंढ पाता था। अंधेपन के कारण दौडते-दौडते वस्तुओं से टकरा जाता था। उसे दिल्ली तक के कई नामीगिरामी चिकित्सालयों में इलाज कराने को लेकर गए। वहां उन्होंने दोनों आंखों के आॅपरेशन के एक लाख रुपये से अधिक मांगे। जो कि केडी हास्पीटल में मात्र लेंस की कीमत सात हजार रुपये ही खर्च हुए। केडी हास्पीटल के नेत्र रोग विभाग में बच्चे इलाज के लिए की भर्ती करने की फीस और बेड चार्ज भी नहीं देना पडा। पडोसी की सलाह पर वह केडी हास्पीटल में डा. नेहा सिंह से आकर मिले। अल्ट्रासाउंड समेत कई खून की जांचें कराने और रुबैला की पूर्व की रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने बताया कि मास्टर जय को जन्मजात मोतियाबिंद है। जो कई तीन या चार साल के बाद हटाने के बाद भी मोतिया बिंद से मुक्ति मिलने की संभावना काफी कम हो जाती है। इसी लिए तीन साल का इंतजार करने के बजाय लक्षण दिखने पर चिकित्सक से तुरंत सलाह लें। मास्टर जय में खून की कमी के कारण पहले कुछ दिन इसका इलाज किया गया। जय के स्वस्थ हो जाने पर उसकी दोनों आंखों के लेंस के मोतियाबिंद का आॅपरेशन एक सप्ताह के अंतर पर किया गया। बच्चे के बेहोश करने पर काफी ध्यान दिया गया। आॅपरेशन टीम में विभागाध्यक्ष डा. दीपक कालरा, डा. नेहा सिंह, डा. नितिन, डा. ज्योत्सना, डा. मल्हार व्यास, एनथिएस्ट डा. सोनी, डा. नवीन सहायक नाहर सिंह, मुकेश और नरेश आदि शामिल रहे।

कंजेनाइटल रुबैला सिंड्रोम से होता है जन्मजात मोतियाबिंद-डा. नेहा सिंह
केडी हास्पीटल के नेत्र रोग विभाग की चिकित्सक और केजीएमसी लखनउ की भूतपूर्व बाल नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. नेहा सिंह ने बताया कि पैदा हुए बच्चांे को कंजेनाइटल रुबैला सिंड्रोम नामक जन्मजात रोग हो सकता है। इसमें बच्चे के ह्दय, कान और आंख में कमी होना स्वाभाविक तौर पर होती है। कई बार बच्चों में ये तीनों तो कई बार एक या दो अंगों में कमी पाई जाती है। कई बार शिशु की आंख में ही मोतिया बिंद का रोग पाया जाता है। कान से कम सुनाई देता है। ह्दय में भी छेद होने जैसी बीमारी इस सिंड्रोम की वजह हो सकती है। ऐसे ही मास्टर जय को इस सिंड्रोम की वजह से आंख में मोतिया बिंद की बीमारी थी। जो कि आॅपरेशन के बाद ठीक कर दी है।

दिल्ली या आगरा के बजाय केडी हास्पीटल में कराएं नेत्र चिकित्सा -डा. रामकिशोर अग्रवाल
आरके एजुकेशन हब के चैयरमेन डा. राम किशोर अग्रवाल, वाइस चैयरमेन पंकज अग्रवाल और एमडी मनोज अग्रवाल ने कहा कि केडी हास्पीटल का नेत्र रोग विभाग चिकित्सा की दृष्टि से सुविधा और उपकरणांे से काफी सुसज्जित है। इस विभाग में काफी काबिल चिकित्सक सेवारत हैं। इन चिकित्सकों और सुविधाओं को लाभ ब्रजवासियों को उठाना चाहिए। नेत्र में रोशनी न होना अपने आप में एक अभिशाप है। इसी को दूर करने को आरके एजुकेशन हब संकल्पित है। उन्होंने लोगों से दिल्ली या आगरा नेत्र चिकित्सा कराने को जाने के बजाय केडी हास्पीटल में ही इन सुविधाओं का लाभ लेने की लोगों से अपील की है।

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