एक शहर ऐसा: जहां ग़ुस्सा करना कल्‍चर के खिलाफ है

ग़ुस्सा इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन होता है. वो इंसान को ख़त्म कर देता है लेकिन फिर भी इंसान इससे बच नहीं पाता. कभी ना कभी कहीं ना कहीं गुस्से में कोई ना कोई ग़लत हरकत कर ही बैठता है
पर एक शहर ऐसा है, जहां ग़ुस्सा करना कल्‍चर और शान के ख़िलाफ़ समझा जाता है. अगर कोई ऊंची आवाज़ में बात करे तो लोग उसे बुरा समझते हैं. उससे दूरी बना लेते हैं.
अब आप सोच रहे होंगे कि हम लखनऊ की बात कर रहे हैं क्योंकि ये बातें तो लखनऊ के बारे में ही कही जाती हैं. कहते हैं लखनऊ के लोग तो गाली भी तमीज़ के दायरे में देते हैं लेकिन हम लखनऊ की बात हरगिज़ नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम बात कर रहे हैं सात समंदर पार के शहर मेक्सिको सिटी की.
मेक्सिको सिटी में कोई भी सार्वजनिक स्थान पर अपना आपा नहीं खोता. बहसबाज़ी हो जाने पर भी उसे प्यार से हल कर लिया जाता है.
शराब पीने के बाद नशे की हालत में तो कोई बदसलूकी शायद कर भी दे लेकिन होशो-हवास में कोई ऐसी ग़लती कभी नहीं करता.
मेक्सिको सिटी शहर में बचपन से ही बच्चों को अपने जज़्बात पर काबू रखना और शांत रहना सिखाया जाता है. यहां के लोगों का मानना है कि गुस्से में आप अपना सब कुछ गंवा देते हैं.
यहां के लोगों में ग़ज़ब का सब्र देखने को मिलता है. अगर लोग कहीं लाइन में खड़े होते हैं तो धीरज के साथ अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं.
यहां कोई हड़बड़ी में नज़र नहीं आता. छोटी-छोटी ग़लतियों पर बिला झिझक माफ़ी मांग लेते हैं. छोटी-छोटी मेहरबानियों पर दिल से शुक्रिया अदा करते हैं.
शिष्टाचार का ये बर्ताव यहां के लोगों में पीढ़ियों से चला आ रहा है. इसके पीछे मेक्सिको के मूल निवासी माने जाते हैं. यूरोपियन लोगों के मेक्सिको पहुंचने से पहले वहां एज्टेक सभ्यता आबात थी.
1519 में जब स्पेन ने मेक्सिको पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया. इसके बाद यहां पर स्पेन और एज़्टेक सभ्यताओं के मेल से नई संस्कृति ने जन्म लिया. स्पेन के राजाओं ने क़रीब तीन सौ साल तक यहां अपना दबदबा बनाए रखा लेकिन संस्कृति के मामले में मेक्सिको हमेशा आगे रहा.
एज़्टेक साम्राज्य के दौर में आज के मेक्सिको सिटी के इलाक़े को नाहुआ के नाम से जाना जाता था. बाद में इस इलाक़े पर स्पेन के लोगों का रसूख़ क़ायम हो गया था लेकिन यहां आकर सबने वाले स्पेनिश लोगों ने भी मेक्सिको के मूल निवासियों के रिवायती शिष्टाचार के तौर तरीक़े सीखे. इनकी भाषा में भी नाहुआ में स्थानीय स्तर पर बोले जाने वाले शब्द बड़े पैमाने पर शामिल हो गए.
एज़्टेक आदिवासियों की नाहुल्त भाषा आज मोटे तौर पर क़रीब पंद्रह लाख लोग बोलते हैं. इस ज़बान में एक ख़ास तरह की मिठास और अपनापन है.
नाहुआ के कुछ समुदायों में एक चलन और भी है. वो किसी से निगाह मिलाकर बात नहीं करते. हालांकि आम तौर पर माना जाता है कि सामने वाले की आंख में आंख डालकर बात करो. इससे आपका आत्मविश्वास ज़ाहिर होता है लेकिन यहां के लोग इसे ग़ुरूर की अलामत और तहज़ीब के ख़िलाफ़ मानते हैं.
दरअसल मेक्सिको पर लंबे वक़्त तक विदेशियों का राज रहा है. यहां के लोगों में सत्ताधारी पक्ष के लिए हमेशा ही एक अविश्वास का भाव रहा है. शायद इसीलिए यहां के लोग बाहर की दुनिया और अपने बीच एक लाइन खींचे रखना चाहते हैं. शायद इसीलिए उनकी कोशिश रहती है कि उनके शब्दों से किसी कोई दुख ना पहुंचे. यहां तक कि अगर आप किसी से रास्ता पूछें और उसे वो पता नहीं है तो भी वो ना कहने में हिचकिचाएगा.
अगर आपके मिज़ाज में ज़रा भी अकड़ है, ज़बान में शीरीं नहीं तो यहां के लोग आपको नाकाम लोगों की फ़ेहरिस्त में शामिल कर लेंगे.
तमाम ख़ूबियों के बावजूद ये कहना भी ग़लत ही होगा कि मेक्सिकों में सभी बहुत अच्छे मिज़ाज के लोग हैं. कुछ बुराईयां यहां के लोगों में भी हैं. लेकिन ज़्यादातर ख़ुशमिज़ाज हैं. अपने शहर में आने वाले सैलानियों को पूरा समय देते हैं.
शायद यहां के लोगों की यही अदा इस शहर को बहते पानी की तरह से अपने साथ बहाए ले जा रही है. और ये शहर अपनी अलग पहचान बनाए हुए है.
कभी मौक़ा लगे तो आप भी मेक्सिको सिटी घूम आएं.
-BBC