96 साल के ‘दादा रेनबो’ ने अपनी चित्रकारी से बचा लिया पूरा एक गांव

सुबह के चार बजे हैं. सेंट्रल ताइवान अंधेरे में डूबा है. 28 लाख आबादी वाले ताइचुंग शहर की नियॉन लाइट्स बंद हैं और लोग गहरी नींद में हैं.
रात के इस सन्नाटे में 96 साल के एक बुज़ुर्ग धीरे-धीरे पेंटिंग कर रहे हैं.
हुआंग युंग-फू के लिए यह रोज़ की बात है. हर सुबह वह हाथों में पेंट के डिब्बे लेकर अपने दो कमरे के बंगले से बाहर गलियों में निकलते हैं.
जब उनका शहर सो रहा होता है, हुआंग क़रीब तीन घंटे तक सीमेंट की दीवारों को, पैदल रास्तों को और खिड़कियों को रंगीन चित्रों से सजाते हैं.
हुआंग का ये सफ़र अपने बेडरूम में एक चिड़िया का चित्र बनाने से शुरू हुआ था और अब तक वह दसियों हज़ार चित्र बना चुके हैं.
पुरानी सैनिक बस्ती, जिसे अब रेनबो विलेज़ के नाम से जाना जाता है, में कंक्रीट का हर टुकड़ा कार्टून जैसे व्यक्तियों, अमूर्त जानवरों और अति यथार्थवादी चित्रों से सजा है.
हर साल 10 लाख से ज़्यादा लोग इस गांव में आते हैं और यहां के इस बुज़ुर्ग कलाकार से मिलते हैं. वह यहां के अकेले स्थायी निवासी हैं. लोग उनको प्यार से ‘दादा रेनबो’ कहकर बुलाते हैं.
चित्रकारी से बचा गांव
पेंट से भरी गलियों में घूमते हुए चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है. दीवार से छलांग लगाते हुए बाघ, गलियों में छिपते बिल्ली के बच्चे और परेड करते हुए पांडा और मोर दिखते हैं.
हुआंग के चित्रों में दरवाज़ों से झांकते लोग भी हैं. आप वहां रुकें तो नृत्य करते समुराई, हवा में तैरते अंतरिक्षयात्री और चुंबन लेते प्रेमी जोड़े चकित कर देते हैं.
गांव के सभी कोनों को अपने सपनों के रंग में रंग चुके हुआंग ने सिर्फ़ 10 साल पहले चित्रकारी शुरू की थी. उस समय उनकी उम्र 86 साल थी.
उन्होंने न सिर्फ़ अपनी बस्ती को एक रियल-लाइफ़ स्टोरी बुक बना दिया है, बल्कि इसे ध्वस्त होने से भी बचा लिया है.
हुआंग बताते हैं, “10 साल पहले सरकार ने इस गांव को गिराने की धमकी दी थी. लेकिन मैं नहीं गया. ताइवान में मेरे पास यही एक घर है, इसलिए मैं चित्रकारी करने लगा.”
ताइवान पलायन
हुआंग का जन्म चीन के ग्वांगझू के बाहर हुआ था. उन्हें याद है कि पांच साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ रेखाचित्र बनाए थे.
1937 में जब वे 15 साल के थे जब दूसरे चीन-जापान युद्ध में जापान से लड़ने के लिए उन्होंने घर छोड़ दिया था.
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद चीन में गृहयुद्ध भड़का तो हुआंग, माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के ख़िलाफ़ लड़ाई में शामिल हो गए.
1949 में नेशनलिस्ट पार्टी हार गई और माओ ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की स्थापना कर दी.
हुआंग और क़रीब 20 लाख सैनिकों के परिवार अपने नेता चियांग काई शेक के साथ ताइवान पलायन कर गए.
शरणार्थियों और सैनिकों के परिवारों को सैकड़ों अस्थायी सैनिक बस्तियों में बसाया गया. इन बस्तियों के घरों को हड़बड़ी में बनाया गया था. उन्हें उम्मीद थी कि राष्ट्रवादी सेना चीन की मुख्य भूमि पर फिर से क़ब्ज़ा करेगी.
वह समय कभी नहीं आया और समय के साथ ये अस्थायी घर स्थायी हो गए.
ताइवान के विभिन्न एयरबेस पर तैनाती के दौरान हुआंग को दो बार गोली लगी. ताइवान खाड़ी के दूसरे संकट के दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे.
1978 में जब वह सेना रिटायर हुए तब “ताइवान की रक्षा” करने के लिए उन्हें गोल्ड मेडल मिला.
उन्होंने अपनी सारी बचत जुटाई और इस गांव के एक बंगले में रहने आ गए. यहां वह पिछले 40 साल से रह रहे हैं.
उनके घर के मुख्य दरवाज़े पर पेंट ब्रश लिए एक सैनिक का चित्र बना है. यहां आने वाले सैलानियों के लिए यही उनके घर की पहचान है.
सैनिक से कलाकार
चीन की मुख्य भूमि पर फिर से अधिकार करने का राष्ट्रवादियों का सपना दम तोड़ने लगा तो पूर्व सैनिकों के परिवार अपने घरों को छोड़कर जाने लगे. बेतरतीब ढंग से बनाए गए घर उजाड़ होने लगे.
1980 और 90 के दशक में ताइवान सरकार ने उन घरों को गिराकर वहां बहुमंज़िला इमारतें बनाने का अभियान शुरू किया. अब 879 सैनिक गांवों में से सिर्फ़ 30 बचे हैं.
हुआंग कहते हैं, “जब मैं यहां आया था तब इस गांव में 1,200 घर थे. हम सब एक बड़े परिवार की तरह साथ बैठते और बातें करते थे. फिर सभी लोग जाने लगे या उनकी मौत होने लगी और मैं अकेला रह गया.”
2008 तक रियल एस्टेट बिल्डरों ने 11 को छोड़कर सभी 1,200 घरों पर क़ब्ज़ा कर लिया. हुआंग ने देखा कि उनके सभी दोस्त एक-एक करके जा रहे हैं.
हुआंग अविवाहित थे और ताइवान में उनका कोई परिवार नहीं था. उनके पास कोई दूसरा घर भी नहीं था जहां वह जा सकें. इसलिए वह अकेले रह गए.
उसी साल गर्मियों में सरकार ने उनको गांव छोड़कर जाने को कहा. तब इस पूर्व सैनिक ने वह किया जो स्कूल के दिनों के अलावा उन्होंने कभी नहीं किया था. उन्होंने एक पेंटब्रश उठाया.
हुआंग ने सबसे पहले अपने बंगले में एक छोटी चिड़िया बनाई. फिर कुछ बिल्लियां, इंसान और हवाई जहाज़ बनाए.
जल्द ही उनकी चित्रकारी घर से बाहर से आने लगी और वह गांव के वीरान घरों और गलियों में रंगीन चित्र बनाने लगे.
बाहर वालों का ध्यान
2010 की एक रात को हुआंग जब चांद की रोशनी में अपने काम में लगे हुए थे तब लिंग तुंग यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने इस बुज़ुर्ग चित्रकार को देखा.
पेंट ब्रश से सरकारी बुलडोज़र को रोकने की हुआंग की कोशिश के बारे में जानकर वह दंग रह गया.
कंक्रीट पर बनाए गए हुआंग के कुछ चित्रों की तस्वीर खींचने के बाद उस छात्र ने एक फंडरेजिंग कैंपेन शुरू किया जिससे हुआंग के लिए जितना संभव हो उतना पेंट ख़रीदा जा सके और सैनिक बस्ती को गिराने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दाख़िल की जा सके.
ताइचुंग के कल्चरल अफ़ेयर्स ब्यूरो के मुख्य सचिव आंद्री यी-शान यांग कहते हैं, “लोग इस कलाकार के जुनून और एक बूढ़े व्यक्ति की मदद करने के लिए छात्रों की कोशिश को देखकर हैरान रह गए.”
“दादा रेनबो” के बारे में ख़बर फैली तो यह तुरंत ही राष्ट्रीय मुद्दा बन गई. सबका ध्यान उनकी ओर गया.
कुछ ही महीनों के भीतर ताइचुंग के मेयर को 80 हज़ार ईमेल आए जिनमें नागरिकों ने गुज़ारिश की थी कि वह सैनिक बस्ती को ना उजाड़ें.
अक्तूबर 2010 में मेयर ने आदेश जारी किया कि बची हुई 11 इमारतें, गलियां और उसके आसपास के इलाक़े को एक पब्लिक पार्क के रूप में संरक्षित किया जाएगा.
यांग कहते हैं, “उनके काम को देखना और उनकी कहानी सुनना दिल को छू जाता है. यहां कोई हिंसक प्रदर्शन नहीं था. उन्होंने मदद की गुहार भी नहीं लगाई. वह सिर्फ़ अपने घर को प्यार कर रहे थे.”
मोर्चे पर डटे
अपने घर और बस्ती को बचा लेने के बाद भी हुआंग सूरज उगने से पहले जग जाते हैं. वह पेंट ब्रश उठाते हैं और ड्यूटी पर निकल जाते हैं. सेना के शुरुआती दिनों से उनका यही रूटीन है.
वह कहते हैं, “मैं अब कई चीज़ें नहीं कर सकता, लेकिन मैं पेंट कर सकता हूं. यह मुझे तंदुरुस्त रखता है. थोड़ा रंग लगा देने से पुरानी चीज़ें सुंदर हो जाती हैं.”
यह आदत उनको जवान भी रखती है. हुआंग के सारे चित्र उनके बचपन की यादों और कल्पनाओं से जुड़े हैं.
इनमें एक सैनिक के जीवन की कविता भी है जिसने 70 साल तक पेंट ब्रश नहीं उठाया.
अब वह उस पपी के चित्र बना रहे हैं जिसे वह बचपन में प्यार करते थे. वह अपने पसंदीदा शिक्षकों के और चीन के गांवों में उनके साथ खेलने वाले छोटे भाइयों के चित्र बनाते हैं.
“रेनबो विलेज” में हुआंग की मदद करने वाले स्टाफ़ मेंबर लिन यंग काई कहते हैं, “यहां आने वाले लोग उनकी कला की तुलना स्पेनिश पेंटर जॉन मिरो या जापानी एनिमेटर और फ़िल्मकार हयाओ मियाज़ाकी से करते हैं. वह सिर्फ़ अपनी भावनाओं और अपनी यादों को पेंट करते हैं.”
ओपेन हाउस
रंगों में डूबी बस्ती की तस्वीरें दुनिया भर में फैलीं तो कैमरा-प्रेमी सैलानियों की संख्या बढ़ गई.
ताइचुंग के अधिकारियों के मुताबिक़ 2016 में साढ़े बारह लाख से ज़्यादा लोग रेनबो विलेज आए.
हुआंग आम तौर पर घर से बाहर आकर मेहमानों से मिलते हैं. वह गले तक बंद बटन वाली क़मीज़ और फ्लैट कैप पहनते हैं. उनके हाथों में पेंट के ताज़े निशान रहते हैं जो सुबह-सुबह उनके काम के दौरान लगते हैं.
पिछले 10 साल से हुआंग पेंट ख़रीदने के लिए उन सिक्कों पर निर्भर हैं जिनको लोग उनके बंगले के बाहर लगे डोनेशन बॉक्स में डाल जाते हैं.
लिन और कुछ अन्य युवकों का एक ग्रुप अब उनके बनाए चित्रों के पोस्टकार्ड और इलस्ट्रेशन बेचने में मदद कर रहा है. इनसे मिले पैसे में से जो बच जाते हैं उसे बुज़ुर्गों की मदद करने वाले स्थानीय संगठनों को दान कर दिया जाता है.
जब गांव में सैलानियों की संख्या ज़्यादा बढ़ जाती है तब वह अपने बंगले के अंदर चले जाते हैं या पास की एक जलधारा के पास जाकर अपनी आंखें बंद कर लेते हैं और पानी की कल-कल ध्वनि को सुनते हैं.
ताइपे से आई पर्यटक ईस्टर यू-सी कहती हैं, “यह बहुत प्रेरणादायक है. दादा रेनबो ही नही, उनकी पेंटिंग्स भी. गलियों में बहुत से लोग कला को जन्म दे रहे हैं लेकिन ऐसा कोई नहीं है.”
दादा रेनबो
हाल के वर्षों में हुआंग की सेहत बहुत गिरी है. उनको कई बार आईसीयू में रखना पड़ा. “कभी मेरा हृदय, कभी मेरे फेफड़े. मुझे लगता है कि मैं बूढ़ा हो रहा हूं.”
लोग उनको दादा कहते हैं, लेकिन उनकी अपनी कोई संतान नहीं है. उनकी कभी शादी नहीं हुई थी और वे अपने घर में हमेशा अकेले रहे.
2013 में हुआंग को प्यार हो गया- अस्पताल में. उनको निमोनिया हुआ था. अस्पताल में उन्हें एक बूढ़ी नर्स से प्यार हो गया जो उनकी सेवा कर रही थी. उन्होंने जल्द ही शादी कर ली.
अब रेनबो विलेज की आबादी एक से बढ़कर दो हो गई है. चित्रों से भरे हुआंग के बंगले और उनकी काल्पनिक दुनिया में दादी रेनबो आ गई हैं.
वह कहते हैं, “जबसे मैं उनसे मिला हूं, तब से मेरे फेफड़ों में ही तकलीफ़ हुई है. मेरा दिल पहले से बेहतर है.”
घर में कलाकार
लंबे अंतराल के बाद हुआंग अब धीरे-धीरे अपने बंगले से बाहर आने लगे हैं. दोपहर बाद की धूप में वह सैलानियों से मिलते हैं.
सैलानी जब तस्वीर खिंचवाने के लिए खड़े होते हैं तो दादा रेनबो अंगुलियों से विक्ट्री का “V” साइन बनाते हैं और सैलानियों से दोबारा आने की गुज़ारिश भी करते हैं.
कोई नहीं जानता कि हुआंग कब तक पेंट करने के क़ाबिल रहेंगे और उनके जाने के बाद उनकी बनाई इस रंगीन दुनिया का क्या होगा.
ऐसी चर्चा है कि रेनबो विलेज को बच्चों के एक आर्ट स्कूल में बदल दिया जाएगा या हुआंग के बंगले को म्यूज़ियम बना दिया जाएगा. लेकिन 96 साल के हुआंग एक दिन से ज़्यादा की नहीं सोचते.
“यदि मैं कल सुबह उठकर पेंट करने जा सका तो मैं जाऊंगा. यदि नहीं जा सका तो यह जानकर ख़ुश रहूंगा कि यह जगह रहेगी और लोगों को ख़ुश करती रहेगी.”
-एजेंसियां

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