कविताएं: कुआँ सूख गया गाँव का, पानी खरीदते जाइए

1. ज़रा पूछो तो

वो क्यों हैं परेशान , ज़रा पूछो तो
दिल क्यों बना मशान, ज़रा पूछो तो।

रिश्ते तो खूब बनाए तुमने बेधड़क
लहूलुहान है क्यों जुबां ,ज़रा पूछो तो।

माँ-बाप को भेज तो दिया है बाहर
घर में है क्यों तूफाँ ,ज़रा पूछो तो।

सियासतदां कहते हैं ,सब ठीक है
सूना पड़ा क्यों रमज़ान ,ज़रा पूछो तो।

दौलत की कमी तो नहीं थी तुम्हें
बिक गया क्यों मकाँ ,ज़रा पूछो तो।

जितने कड़े दरख़्त थे,सब उखड़ गए
फिर है क्यों गुमाँ ,ज़रा पूछा तो ।

आफत आती है तो गरीबों पे आती है
परेशान है क्यों हुक्मराँ ,ज़रा पूछो तो ।

2. जो परिन्दे डरते हैं हवाओं के बदलते रूख से

जो मकाँ बनाते हैं,वो अपना घर नहीं बना पाते
रेगिस्तान में उगने वाले पौधे जड़ नहीं बना पाते।

जिन्हें आदत हैं औरों के रहमो-करम पे जीने के
वो कूबत होते हुए भी अपना डर नहीं बना पाते।

जो पहचानते हैं इंसानों को सिर्फ औकात से
वो कभी किसी के दिल तक दर नहीं बना पाते।

जो परिन्दे डरते हैं हवाओं के बदलते रूख से
वो सारे उड़ने के लिए अपना पर नहीं बना पाते।

जिनकी जवानी बन गई जीहुजूरी का दूसरा नाम
वो ज़ुल्म के खिलाफ उठने वाला सर नहीं बना पाते।

3.  मैैं जितना ही हूँ, उतना तो जरूर हूँ

अब इस तरह मुझे न बचा के रख
फानूस के जैसे तो न सजा के रख।

मैं खुद तलाश लूँगा अपनी मंज़िलें
बाज़ार में दाम मेरा न बता के रख।

मैं नई सुबह का नया सूरज सा हूँ
मुझे दिए की तरह न बुझा के रख

हैं ज़िन्दा बे-शक अहसासात सभी
यूँ असबाब के जैसे न उठा के रख।

मैं जितना ही हूँ,उतना तो जरूर हूँ
यूँही बस हिसाब से न घटा के रख।

4. जरूरी तो नहीं

हर सवाल का जवाब हो,जरूरी तो नहीं
मोहब्बत में भी हिसाब हो,जरूरी तो नहीं

पढ़नेवाला सब कुछ पढ़ ले,जरूरी तो नहीं
हर चेहरा खुली किताब हो,जरूरी तो नहीं।

जवानी जलती सी आग हो,जरूरी तो नहीं
और हर शोर इंक़लाब हो,जरूरी तो नहीं।

रिश्ते सब निभ ही जाएँ, जरूरी तो नहीं
बगीचे में सिर्फ गुलाब हो,जरूरी तो नहीं।

जो जलता है काश्मीर हो,जरूरी तो नहीं
उबलता झेलम-चनाब हो,जरूरी तो नहीं।

लाशों से भरा चुनाव हो, जरूरी तो नहीं
सरहद पे फिर तनाव हो, जरूरी तो नहीं।

5. वो जो अपने होंठों पर अंगार लिए चलते हैं

वो जो अपने होंठों पर अंगार लिए चलते हैं
मचलते यौवन का चारमीनार लिए चलते हैं।

ज़ुल्फ़ में पंजाब,कमर में बिहार लिए चलते हैं
हुश्न का सारा मीना-बाज़ार लिए चलते हैं।

जिस मोड़ पर ठहर जाएँ,जिस गली से गुज़र जाएँ
अपने पीछे आशिकों की कतार लिए चलते हैं।

कोतवाली बन्द,अदालतों की दलीलें सब रद्द
सारे महकमे को कर बीमार लिए चलते हैं।

आँखें काश्मीर,चेहरा चनाब का बहता पानी
क़त्ल करने का सारा औज़ार लिए चलते हैं।

जो देख लें तो मुर्दे भी जी उठे कसम से
अपने तबस्सुम में इक संसार लिए चलते हैं।

6. कुआँ सूख गया गाँव का,पानी खरीदते जाइए

कुआँ सूख गया गाँव का,पानी खरीदते जाइए
आने वाली मौत की कहानी खरीदते जाइए।

बूढ़ा बरगद,बूढ़ा छप्पर सब तो ढह गए
शहर से औने-पौने दाम में जवानी खरीदते जाइए।

नहीं लहलहाते सरसों,न मिलती मक्के की बालियाँ
बच्चों के लिए झूठी बेईमानी खरीदते जाइए।

रिश्तों की बाट नहीं जोहते कोई भी चौक-चौबारे
आप भी झोला भरके बदगुमानी खरीदते जाइए।

नींद लूट के ले गई भूख पेट की
सुलाने के लिए दादी-नानी खरीदते जाइए।

कहते हैं कि वो गाँव अब भी बच जाएगा
हो सके तो थोड़ी नादानी खरीदते जाइए।

 

रचनाकार – सलिल सरोज,
कार्यालय महानिदेशक लेखापरीक्षा,वैज्ञानिक विभाग,
नई दिल्ली में सीनियर ऑडिटर के पद पर 2014 से कार्यरत हैं

 

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