43 प्रतिशत देश ‘लॉकडाउन’ से बाहर: हर्ड इम्यूनिटी का टेस्ट भी शुरू

नई दिल्‍ली। कोरोना वायरस महामारी को रोकने के लिए लागू किए गए ‘लॉकडाउन’ 3.0 के दौरान ग्रीन जोन्स में काफी छूट दी गई है। देश के कुल जिलों में से 43 प्रतिशत से ज्यादा ग्रीन जोन्स में हैं, जहां लोगों के आने-जाने और काम करने पर लगी रोक एक तरह से हट गई है। कह सकते हैं कि 43 प्रतिशत देश अब कोरोना संकट के बीच सामान्य जनजीवन की तरफ बढ़ चला है।
तो क्या ग्रीन जोन्स में हर्ड इम्यूनिटी का टेस्ट भी शुरू हो चुका है, जिसे तमाम विशेषज्ञ कोरोना के खिलाफ प्लान बी बता रहे हैं? इसका जवाब है- हां, कुछ हद तक।
43% देश एक तरह से कोरोना संक्रमण के लिए खुला!
सोशल डिस्टेंसिंग के पालन की शर्तों के साथ ग्रीन जोन्स में दुकानें, बाजार, दफ्तर, ऑटो, टैक्सी, बस, कारोबारी और औद्योगिक गतिविधियों को इजाजत दी जा चुकी है। इन जगहों पर लोग अब एक जगह से दूसरे जगह आसानी से जा रहे हैं। धीरे-धीरे फिर से काम-धंधा शुरू कर चुके हैं। 43 प्रतिशत जिलों की आबादी का एक तरह से कोरोना वायरस के प्रति एक्सपोजर बढ़ चुका है। इससे इस बात का भी अंदाजा लग सकेगा कि क्या ग्रीन जोन्स में लोगों के बीच कोरोना वायरस के प्रति हर्ड इम्यूनिटी विकसित हो रही है। हालांकि, इसे कुछ हद तक ही हर्ड इम्यूनिटी का टेस्ट कह सकते हैं क्योंकि ग्रीन जोन्स वे इलाके हैं जहां अब तक या तो एक भी कोरोना के केस नहीं आए हैं या फिर पिछले 21 दिनों से एक भी केस नहीं है।
कुछ हद तक ही हर्ड इम्यूनिटी का टेस्ट!
आदर्श स्थिति में हर्ड इम्यूनिटी का टेस्ट तब कहा जा सकता है जब रेड जोन्स में भी लोग कोरोना के खतरे के बावजूद पहले की तरह अपनी सामान्य गतिविधियों को चलाते। इस तरह से लोग बड़ी तादाद में कोरोना से संक्रमित होते और आखिरकार उनमें इसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती, जिसे हर्ड इम्यूनिटी कहा जाता है। ग्रीन जोन्स में संक्रमण का जोखिम बहुत ही कम है इसलिए वहां पूरी तरह से सामान्य जनजीवन को भी हर्ड इम्यूनिटी का कुछ हद तक ही टेस्ट कह सकते हैं। फिलहाल देश में रेड जोन में 130 जिले हैं, ऑरेंज जोन में 284 जिले और ग्रीन जोन में 319 जिलों को रखा गया है।
क्या है ‘हर्ड इम्यूनिटी’?
दरअसल, जब बहुत सारे लोग किसी संक्रामक बीमारी के प्रति इम्यून हो जाते हैं यानी उनमें उसके प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है तो वह बीमारी बाकी बचे असंक्रमित लोगों को अपनी चपेट में नहीं ले पाती है क्योंकि पूरा समूह ही इम्यून हो चुका होता है। इसी को हर्ड इम्यूनिटी कहते हैं। यह प्रतिरोधक क्षमता या तो वैक्सीन के जरिए मिलेगी या फिर बड़ी तादाद में लोगों के संक्रमित होने और उनके भीतर संबंधित बीमारी के प्रति इम्यूनिटी विकसित होने से होगी।
उदाहरण के तौर पर न्यूमोनिया और मेनिन्जाइटिस जैसी बीमारियों की वैक्सीन देकर बच्चों को इसके प्रति इम्यून बनाने का नतीजा यह हुआ कि वयस्क लोगों के इन बीमारियों की चपेट में आने की गुंजाइश बहुत कम हो गई।
कैसे काम करती है हर्ड इम्यूनिटी
अगर कुछ लोगों में ही किसी बीमारी के प्रति इम्यूनिटी है तो वह संक्रामक बीमारी आसानी से फैलती है। अगर ज्यादातर लोगों में वैक्सीन या एक्सपोजर की वजह से इम्यूनिटी आ जाए तो वायरस का फैलना रुक जाता है।
कितने प्रतिशत लोगों में इम्यूनिटी मानी जाएगी हर्ड इम्यूनिटी
विशेषज्ञों के मुताबिक, कोविड-19 की बात करें तो अगर 60 से 85 प्रतिशत आबादी में इसके प्रति इम्यूनिटी आ जाए तो इसे हर्ड इम्यूनिटी करेंगे। डिप्थीरिया में यह आंकड़ा 75 प्रतिशत, पोलियो में 80 से 85 प्रतिशत और मीजल्स में 95 प्रतिशत है।
बहुत जोखिमभरा होगा पूरी आबादी को संक्रमण के लिए खुला छोड़ना
हर्ड इम्यूनिटी के लिए लोगों को संक्रमित होने के लिए छोड़ना बहुत खतरनाक हो सकता है। 60 से 85 प्रतिशत आबादी संक्रमित हो जाए तो इसके विनाशकारी नतीजों की कल्पना तक नहीं की जा सकती। तब लाखों लोग या हो सकता है कि करोड़ में लोगों की मौत हो जाए। कनाडा के चीफ पब्लिक हेल्थ ऑफिसर थेरेसा टैम ने चेताया है कि अगर ऐसा किया गया तो मौत ही नहीं, बीमारी के असर भी खतरनाक साबित होंगे। उन्होंने कहा, ‘सिर्फ मौत ही चिंता की बात नहीं है। बीमारी से जो जिंदा बच रहे हैं उनके किडनी, लिवर, हृदय और दिमाग को होने वाला नुकसान भी बड़ी चिंता की बात होगी।’
-एजेंसियां

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