4000 साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता एक बार फिर सुर्खियों में

4000 साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इसकी लिपि आज भी वैज्ञानिकों, भाषाविदों, पुरातत्वविदों और अन्य सभी लोगों के लिए गूढ़ समस्या बनी हुई है।
केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार आम बजट पेश करते हुए सिंधू घाटी सभ्यता का जिक्र किया था। निर्मला सीतारमण ने दावा किया था कि सरस्वती सिंधु सभ्यता की लिपि से पता चलता है कि भारत मेटलर्जी और कारोबार से आगे था। निर्मला सीतारमण के इस दावे ने 4000 साल पुरानी सभ्यता को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है जिसकी लिपि की व्याख्या वैज्ञानिकों, भाषाविदों, पुरातत्वविदों और अन्य लोगों के लिए आज भी गूढ़ समस्या बनी हुई है। यह काम इतना जटिल है कि 2004 में इसके वर्णन के लिए डॉलर 10 हजार के इनाम की घोषणा की गई थी जिस पर अभी तक दावा नहीं हुआ है।
भारतविद और भाषाविद की अलग-अलग राय
सिंधु घाटी सभ्यता का पहला शहर हड़प्पा था जिसे 1920-21 में खोजा गया था और खुदाई में इसके अंश मिले थे लेकिन एक सदी बाद भी कोई भी रिसर्चर आखिरकार इसकी लिपि की व्याख्या क्यों नहीं कर पाया?
यह एक बड़ा सवाल है। इस बीच कई दावे हुए लेकिन वे असफल रहे। वास्तव में लिपि की प्रकृति को लेकर भाषाविद और भारतविदों में काफी हद तक असहमति है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के भारतविद प्रोफेसर माइकल विट्जेल और अन्य ने 2004 में दावा किया था कि सिंधु लिपि शायद भाषाई नहीं रही होगी, वहीं फिनलैंड की हेलंसिकी यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रफेसर अस्को परपोला 1968 से इस लिपि की व्याख्या की कोशिश कर रहे हैं। वहीं कुछ का कहना है कि सिंधु लिपि काफी हद तक भाषाई थी और शायद द्रविड़ परिवार से संबंधित होगी।
सिंधु लिपि को लेकर भाषाविद का तर्क
कुल मिलाकर सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि की व्याख्या अब तक पूरी नहीं हो सकी है। प्रोफेसर विट्जेल इसके पीछे दो वजह बताते हैं। ‘पहली, हम यह नहीं जानते कि सिंधु सभ्यता में कौन की भाषा बोली जाती थी। दूसरा, हमें यह भी नहीं मालूम कि सिंधु संकेतों भाषाई थे भी या नहीं।’ वह आगे कहते हैं, ‘उनमें से कुछ स्पष्ट रूप से जाहिर होते हैं जैसे कोई बीज, या हल वगैरह। लेकिन पेड़ में गिलहरी या तालाब में बतख का क्या मतलब है? इसको लेकर जितने भी प्रयास किए गए उनका अब तक कोई उपयुक्त निष्कर्ष नहीं निकला है।’
सिंधु लिपि की व्याख्या में क्या हैं चुनौतियां?
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च मुंबई की डॉ. निशा यादव ने भी कुछ समस्याएं जाहिर कीं। उन्होंने बताया, ‘सिंधु लिपि की संक्षिप्तता (औसतन एक टेक्स्ट की लंबाई 5 संकेतों की होती है), द्विभाषीय या बहुभाषीय टेक्स्ट की कमी और सिंधु घाटी सभ्यता के पतन में परंपराओं में असंतोष अन्य समस्याएं भी इसके पीछे वजह हैं। वहीं रिटायर्ड प्रोफेसर परपोला अपने आंकलन पर अडिग है। वह कहते हैं, ‘मेरी राय है कि हड़प्पन भाषा द्रविड़ परिवार की भाषा (तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगू, और करीब 20 जनजाति भाषा) से ताल्लुक रखती है और सिंधु लिपि की एक सीमा तक द्विभाषीय के बिना व्याख्या की जा सकता है।’
कितनी पुरानी है सिंधु घाटी सभ्यता?
बता दें कि सिंधु घाटी सभ्यता को दुनिया की सबसे पुरानी और उन्नत सभ्यताओं में गिना जाता है। कुछ साल पहले आईआईटी खड़गपुर और भारतीय पुरातत्व विभाग के वैज्ञानिकों ने दावा किया था सिंधु घाटी सभ्यता मिस्र और मेसोपोटामिया सभ्यता से भी पुरानी है। वैज्ञानिकों का यह शोध प्रतिष्ठित रिसर्च पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित हुआ था। शोधकर्ताओं का मानना है कि सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार भारत के बड़े हिस्से में था। यह सिंधु नदी के किनारे से लेकर लुप्त हो गई सरस्वती नदी के किनारे तक बसी थी। रिसर्च में यह भी सामने आया था कि हड़प्पा सभ्यता को अपने आखिरी चरण में खराब मॉनसून का सामना करना पड़ा था। इसके चलते बड़े पैमाने पर लोगों ने पलायन किया, संख्या में गिरावट आई, बस्तियों के खाली हो जाने और बाद में हड़प्पा की लिपि ही लुप्त हो गई थी।
-एजेंसियां

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