1984 बनाम 2002: तेरा दंगा मेरे दंगे से सफेद कैसे

आज बीबीसी की वेब साइट पर ‘वरिष्‍ठ पत्रकार’ उर्मिलेश जी का लेख पढ़ा। इस लेख के तहत उन्‍होंने बड़ी सफाई से इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद 1984 में हुए सिखों के कत्‍लेआम की तुलना उसी प्रकार 2002 के गुजरात दंगों से की है जिस प्रकार कांग्रेस के प्रवक्‍ता टीवी चैनल्‍स की डिबेट में करते रहे हैं।
‘नज़रिया’ नाम से प्रकाशित बीबीसी के इस कॉलम में उर्मिलेश जी ने कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी के कथन पर भारतीय न्‍यूज़ चैनल्‍स के रवैये को सरकारी चमचागीरी बताया है और विदेशी मीडिया की इस बात के लिए तारीफ की है कि उसने राहुल की बातों में वैचारिक ताज़गी देखी।
उर्मिलेश जी ने आगे लिखा है-
शुक्रवार की रात लंदन में वहां के सांसदों और अन्य गणमान्य लोगों की एक संगोष्ठी में राहुल गांधी ने जिस तरह सन् 1984 के सिख विरोधी “दंगे या कत्लेआम” पर टिप्पणी की, उससे उन पर गंभीर सवाल भी उठे हैं. राहुल ने माना कि सन् 1984 एक भीषण त्रासदी थी. अनेक निर्दोष लोगों की जानें गईं. इसके बावजूद उन्होंने अपनी पार्टी का जमकर बचाव किया.
उर्मिलेश जी ने इसी के साथ यह सवाल भी उछाला है-
इस बात पर कौन यक़ीन करेगा कि सन् 84 के दंगे में कांग्रेस या उसके स्थानीय नेताओं की कोई संलिप्तता नहीं थी ?
सवाल के जवाब में भी उर्मिलेश जी ने एक और सवाल किया है-
ये तो कुछ वैसा ही है जैसे कोई भाजपाई कहे कि गुजरात के दंगे में भाजपाइयों का कोई हाथ ही नहीं था. ऐसे दावों और दलीलों को लोग गंभीरता से नहीं लेते. आख़िर ये दंगे क्या हवा, पानी, पेड़-पौधे या बादलों ने कराए थे?
उर्मिलेश जी अपने ही दोनों सवालों के जवाब में लिखते हैं- हां, ये बात सच है कि उस सिख-विरोधी दंगे में सिर्फ़ कांग्रेसी ही नहीं, स्थानीय स्तर के कथित हिंदुत्ववादी और तरह-तरह के असामाजिक तत्व भी शामिल हो गए थे.
ग़रीब तबके के लंपट युवाओं को दंगे में लूट-पाट के लिए गोलबंद किया गया. मुझे लगता है इसके लिए किसी को ज़्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ी होगी. संकेत मिलते ही बहुत सारे लंपट तत्व लूटमार के लिए तैयार हो गए.
राहुल गांधी के ‘कथन या कथानक’ पर भारतीय मीडिया के रवैये को ‘सरकारी’ घोषित करने वाले उर्मिलेश जी कत्‍लेआम कराने वाले उन कांग्रेसियों और कथित हिंदुत्‍ववादियों का नाम अपने लेख में लिखना भूल गए जबकि खुद उनके शब्‍दों में-
“सन् 1984 के उस भयानक दौर में मैं दिल्ली में रहता था. हमने अपनी आंखों से न केवल सब-कुछ देखा बल्कि उस पर लिखा भी. उस वक्त मैं किसी अख़बार से जुड़ा नहीं था. लेकिन पत्रकारिता शुरू कर चुका था.
उस वक्त मैं दिल्ली के विकासपुरी मोहल्ले के ए-ब्लाक में किराए के वन-रूम सेट में रहता था.
ये बात तो साफ़ है कि वह भीड़ यूं ही नहीं आ गई थी. उसके पीछे किसी न किसी की योजना ज़रूर रही होगी. वह भीड़ ‘ख़ून का बदला ख़ून से लेंगे’ के नारे लगा रही थी. ये नारे कहां से आए? इस बीच जो भी तांडव होता रहा, उसे रोकने के लिए पुलिस या अर्धसैनिक बल के जवान भी नहीं दिखे.
मेरे कमरे में बैठी सरदार जी की पत्नी की आंखों से टप-टप आंसू गिरते रहे. हम कुछ नहीं कर सकते थे. ठीक वैसे ही जैसे गुजरात के कुख्यात दंगों में असंख्य परिजन या पड़ोस के लोग अपने जाने-पहचाने लोगों का मारा जाना या उनकी संपत्तियों का विध्वंस होता देखते रह गए.
उर्मिलेश ने लिखा है, राहुल गांधी ने जब लंदन में कहा कि सन 84 के दंगों में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं थी तो मुझे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के वे बयान याद आने लगे जिनमें वह अक्सर कहा करते थे कि दंगों में उनकी सरकार या पार्टी की कोई भूमिका नहीं है.
मैं यहां उर्मिलेश जी से यह पूछना चाहूंगा कि किन्‍हीं भी परिस्‍थितियों में किसी एक दंगे (1984) की तुलना किसी दूसरे ऐसे दंगे (2002) से कैसे की जा सकती है, जो उस समय हुआ ही नहीं था। सिखों के कत्‍लेआम और गुजरात दंगों के बीच पूरे 18 साल का फासला रहा है। इन 18 सालों में कांंग्रेस ने क्‍या किया। क्‍या 18 साल कांग्रेस ने किसी मौके की ताक में गुजार दिए।
यदि एकबार को यह मान भी लिया जाए कि 84 के कत्‍लेआम और 2002 के दंगों की पृष्‍ठभूमि में कोई आंशिक समानता रही भी तो उर्मिलेश जी यह लिखने का साहस क्‍यों नहीं कर पाये कि कांग्रेस को बचाने के लिए अब राहुल गांधी 2002 के गुजरात दंगों का सहारा ले रहे हैं।
उर्मिलेश जी, क्‍या यह बता पायेंगे कि दुनिया की किसी भी अदालत में कोई अपराधी यह कहकर बच सकता है कि बहुत सारे लोगों ने उसके जैसा अपराध किया है इसलिए उसने कर दिया तो क्‍या गलत कर दिया।
राहुल के कथन पर भारतीय मीडिया के नज़रिए को सरकारी खुशामद बताने वाले उर्मिलेश क्‍या यह स्‍पष्‍ट करेंगे कि वह बड़ी चालाकी के साथ राहुल गांधी और कांग्रेस के साथ खड़े होने की कोशिश क्‍यों कर रहे हैं।
राहुल गांधी यदि कांग्रेस की विरासत के हकदार हैं तो वह अतीत में किए गए कांग्रेस के पापों से किनारा कैसे कर सकते हैं। कांग्रेस किसी व्‍यक्‍ति विशेष का नाम नहीं है, कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन है और उसी राजनीतिक संगठन के लोगों ने अपनी नेता इंदिरा गांधी की हत्‍या के प्रतिशोध में खुलेआम सिखों का कत्‍लेआम किया और करवाया। आज उसी कांग्रेस का उत्तराधिकार राहुल गांधी के पास है। फिर कांग्रेस और राहुल गांधी भी निर्दोष कैसे हुए।
रही बात 84 के सिख दंगों के लिए मनमोहन सिंह द्वारा माफी मांगे जाने की अथवा गुजरात दंगों के लिए मोदी द्वारा माफी न मांगे जाने की, तो हजारों निर्दोष लोगों के कत्‍ल का अपराध किसी माफीनामे के खेल से खत्‍म नहीं हो जाता।
गुजरात दंगों के लिए जिम्‍मेदार गोधरा के नरसंहार में भी और उसके बाद हुए दंगों पर भी कोर्ट ने फैसला सुनाया है लेकिन सिख समुदाय आज भी न्‍याय के लिए दर-दर भटक रहा है जबकि इस बीच माफी मांगने वाले सरदार मनमोहन सिंह पूरे दस साल देश के प्रधानमंत्री रहे।
84 और सन् 2002 के दंगों में अद्भुत साम्य देखने वाले उर्मिलेश अचानक राहुल गांधी के इस व्‍यवहार को बाबरी ध्‍वंस के बाद उपजे भाजपा नेताओं के व्‍यवहार से जोड़ने लगते हैं।
वो लिखते हैं- कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गांधी, भाजपा नेताओं की तरह अपनी पार्टी की हर ग़लती और हर गुनाह पर पर्दा डालने की भौंडी शैली अख्तियार कर रहे हैं.
उर्मिलेश यह तो लिखते हैं कि दोनों पार्टियां दंगे के लिए दोषी ठहराए जाने पर अक्सर एक-दूसरे को कोसती हैं. गुजरात का मामला उठाए जाने पर भाजपा द्वारा सिख विरोधी दंगे का सवाल उठाकर कांग्रेस का मुंह बंद करने की कोशिश की जाती है.
लेकिन उर्मिलेश यह नहीं लिखते कि 1984 में हुए सिखों के कत्‍लेआम को उसके 18 साल बाद हुए गुजरात दंगों से कैसे तोला जा सकता है।
वह छद्म निरपेक्षता की आड़ लेकर दादरी के अख़लाक का और मॉब लिचिंग का जिक्र करना नहीं भूले परंतु केरल और पश्‍चिम बंगाल में हुई बेरहम हत्‍याओं का जिक्र करना जरूरी नहीं समझा।
दरअसल, कोई भी टीवी डिबेट देख लीजिए। हर डिबेट में बेशर्मों का ऐसा पैनल बैठा मिलेगा जो एक अपराध की तुलना दूसरे अपराध से करके अपनी पार्टी अथवा अपनी विचारधारा वाले नेताओं के कुकर्मों को जायज ठहरा रहा होगा।
रटे-रटाए चेहरों वाले पैनल में शामिल लोग मूल मुद्दे से ध्‍यान भटकाने के लिए बहस को किसी भी तरफ मोड़ने में उसी प्रकार माहिर होते हैं जिस प्रकार कोई पेशेवर शातिर अपराधी माहिर होता है।
उर्मिलेश जी, यहां सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी कितने ज्ञानी हैं या विदेशी मीडिया ने उनके विचारों की ताज़गी को समझा, सवाल सिर्फ इतना सा है कि क्‍या किसी अपराध या अपराधी का अनुसरण करके अपने अपराध को जायज ठहराया जा सकता है।
भारतीय मीडिया अगर खुशामद करने में लगा है तो आप क्‍या कर रहे हैं। आप भी तो वही कर रहे हैं। सरकार को न सही, किसी को खुश करने का प्रयास तो आपके द्वारा भी किया जा रहा है।
आपने खुद लिखा है कि 84 का कत्‍लेआम आपके सामने हुआ, और इसीलिए आप यह चिन्‍हित कर पाए कि सिखों का कत्‍लेआम करने वाले भेड़ियों में कांग्रेसियों के साथ-साथ कथित हिंदुत्‍ववादी तथा असामाजिक तत्‍व भी शामिल थे।
तो प्‍लीज, एक जिम्‍मेदार पत्रकार न सही किंतु एक जिम्‍मेदार नागरिक होने के नाते अदालत के सामने पेश होकर बताइए कि सिखों का कत्‍लेआम आपकी आंखों के सामने हुआ और आप विक्‍टिम न होते हुए न्‍याय के लिए उनका नाम बताना चाहते हैं।
आप बताइए कि कांग्रेसियों के साथ कौन-कौन हिंदुत्‍ववादी और असामाजिक तत्‍व सिखों का कत्‍लेआम करने में शामिल थे।
सिखों के कत्‍लेआम पर राजीव गांधी ने क्‍या कहा, गुजरात दंगों के बाद मोदी जी क्‍या बोले, अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी जी से क्‍या कहा और राहुल गांधी अब किसके नक्‍शे कदम पर चल रहे हैं, इन राजनीतिक पचड़ों में पड़ने की बजाय आप तो अपना धर्म निभा दीजिए। यकीन मानिए 34 वर्षों से न्‍याय की आस में टकटकी लगाकर देख रही आंखों के लिए आप किसी दीपक से कम साबित नहीं होंगे।
तुलना करने का काम भारतीय मीडिया और राजनीतिक प्रवक्‍ताओं पर छोड़ दीजिए और राहुल गांधी के ज्ञान को परिभाषित करने का जिम्‍मा विदेशी मीडिया पर जाने दीजिए। आप अपना काम ही कर लीजिए। यकीन मानिए, बहुत सुकून मिलेगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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