भगवान जगन्नाथ Rath yatra के लिए रेलवे चलाएगा 194 ट्रेन

भुवनेश्वर। भगवान जगन्नाथ की Rath yatra के दौरान पुरी जाने के लिए के लिए रेलवे 194 ट्रेन चलाएगा। ईस्ट कोस्ट रेलवे (ईसीओआर) के खुर्दा रोड डिवीजन ने यह फैसला लिया। रेलवे के मुताबिक, ट्रेनें चार जुलाई से 13 जुलाई तक चलाई जाएंगी।

ईसीओआर के डीआरएम के कार्यालय में रेलवे अधिकारियों की बैठक हुई, जिसमें यह फैसला लिया गया। इसके लिए पुरी रेलवे स्टेशन पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए यात्रियों को इसकी जानकारी दी जाएगी। Rath yatra के लिए स्पेशल ऐप ‘ईसीओआर यात्रा’ भी लॉन्च किया गया है। इस ऐप पर पुरी यात्रा से संबंधित सारी जानकारी उपलब्ध रहेगी।

60 नए टिकट बुकिंग काउंटर खोले जाएंगे

बैठक में कई अन्य फैसले भी लिए गए। पुरी रेलवे स्टेशन पर 60 नए रेलवे टिकट बुकिंग काउंटर खोले जाएंगे और ऑटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीनें लगाई जाएगी। पुरी रेलवे स्टेशन पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं। अधिकारियों के मुताबिक, रेलवे स्टेशन पर बड़ी संख्या में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ), स्निफर डॉग्ज, गवर्नमेंट रेलवे पुलिस और जवानों को तैनात किया गया है।

पुरी जगन्नाथ यात्रा का है बड़ा महत्व
हर साल होने वाले इस विशेष आयोजन का हिंदू मान्यताओं में विशेष महत्व है। रथयात्रा में बलभद्र का रथ ‘तालध्वज’ सबसे आगे होता है। बीच में सुभद्रा का रथ ‘पद्म रथ’ होता है। वहीं, सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का ‘नंदी घोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ रथ रहता है। यह रथयात्रा हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को निकाली जाती है।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा क्यों निकाली जाती है?
पुराणों में जगन्नाथ पुरी को धरती का बैकुंठ कहा गया है। स्कंद पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने पुरी में पुरुषोतम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया था। रथयात्रा के पीछे पौराणिक मत यह भी है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन जगन्नाथ पुरी का जन्मदिन होता है। इसके बाद प्रभु जगन्नाथ को बड़े भाई बलराम जी तथा बहन सुभद्रा के साथ मंदिर के पास बने स्नान मंडप में ले जाया जाता है।

उन्हें यहां 108 कलशों से शाही स्नान कराया जाता है। मान्यता यह है कि इस स्नान के बाद भगवान बीमार हो जाते हैं उन्हें ज्वर आता है। 15 दिनों तक उन्हें एक विशेष कक्ष में रखा जाता है और कोई भक्त उनके दर्शन नहीं कर पाता। इस दौरान मंदिर के प्रमुख सेवक और वैद्य उनका इलाज करते हैं।

15 दिन के बाद भगवान स्वस्थ होकर अपने कक्ष से बाहर निकलते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। इसके बाद आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को वे भ्रमण और भक्तों से मिलने के लिए नगर में निकलते हैं।

-एजेंसी

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