विश्व जीवन रक्षक घोल दिवस पर के.डी. हास्पिटल के शिशु रोग विशेषज्ञों ने दी जानकारी

मथुरा। विश्व जीवन रक्षक घोल दिवस पर (ओ.आर.एस. डे) के.डी. मेडिकल कालेज-हास्पिटल एण्ड रिसर्च सेण्टर के शिशु रोग विभाग की तरफ से शनिवार को आयोजित कार्यक्रम में न केवल एक दर्जन से अधिक शिशुओं को निःशुल्क ओ.आर.एस. घोल पिलाया गया बल्कि विशेषज्ञ चिकित्सकों ने इसकी उपयोगिता पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम का शुभारम्भ कालेज की प्राचार्य डा. मंजुला बाई कोडागन्नूर ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर सभी विभागों के चिकित्सक और मेडिकल छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

विभागाध्यक्ष शिशु रोग डा. (कर्नल) अतुल चौबे ने कहा कि डायरिया एक गम्भीर बीमारी है। भारत ही नहीं विकसित देशों में भी डायरिया को निमोनिया के बाद दूसरी सबसे खतरनाक बीमारी माना जाता है। डायरिया से बचने के लिए ओआरएस बेहद प्रभावी तरीका है। विश्‍व स्वास्‍थ्य संगठन ने वर्ष 1978 में घर पर उपलब्ध सामान से ही ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी यानी ओआरटी और ओआरएस की शुरुआत की थी। ओआरएस आने से पहले जहां हर वर्ष देश में 50 लाख से अधिक लोग डायरिया से अपनी जान गंवाते थे वहीं अब यह आंकड़ा 15 लाख से भी काफी कम हो गया है। ओआरएस इस सदी की सबसे बड़ी चिकित्सीय उपलब्धि है। डा. चौबे ने बताया कि अगर बच्‍चे को दिन में तीन या उससे ज्‍यादा बार दस्‍त आएं तो उसे ओआरएस देना शुरू कर देना चाहिए। अगर बच्‍चे की उम्र छह महीने या उससे अधिक है तो उसे 20 मिलीग्राम जिंक रोजाना दिया जा सकता है। अगर बच्‍चे की उम्र छह महीने से कम है तो 10 मिलीग्राम जिंक दिया जा सकता है।

अपने सम्बोधन में डा. हरीश अग्रवाल ने बताया कि ओरल रिहाइड्रेशन साल्ट्स (ओआरएस) डिहाइड्रेशन यानी निर्जलीकरण को दूर करने का एक किफायती और प्रभावशाली उपाय है। दस्त लगने पर शिशुओं के लिए ओआरएस किसी संजीवनी से कम नहीं है। डायरिया की चपेट में आने वाले बच्चों को बिना चिकित्सकीय सलाह के भी ओआरएस का घोल दिया जा सकता है। ऐसा करने से बच्चों के शरीर में पानी की कमी नहीं होती। डा. अग्रवाल ने कहा कि अक्सर हम बच्चे को दस्त लगने पर उसे दवा खिलाने लगते हैं जबकि कई बार इसकी जरूरत भी नहीं होती। दरअसल डायरिया तीन-चार दिनों में केवल ओआरएस के घोल से ही ठीक हो जाता है। ओआरएस घोल सिर्फ बच्चों ही नहीं बल्कि किसी भी उम्र के डायरिया पीड़ित के लिए उचित इलाज है। डा. अग्रवाल ने बताया कि दस्त होने पर प्रायः लोग खान-पान बंद कर देते हैं जोकि उचित नहीं है। माताओं को ऐसे समय में बच्चे को स्तनपान जरूर कराना चाहिए। इस अवसर पर डा. जीतेन्द्र सिंह राठौर, डा. प्रीति टंडन, डा. नंदगोपाल आदि ने भी ओआरएस पर अपने विचार व्यक्त किए।

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