निकाय चुनाव या पांच साला गिद्धभोज की तैयारी ?

यूं तो गिद्ध शिकारी पक्षियों के अंतर्गत आने वाले ”मुर्दाखोर” पक्षियों के “कुल” का पक्षी है किंतु इस पक्षी में सात और आश्‍चर्यजनक गुण पाए जाते हैं, और इत्तिफाक से उसके सातों गुण हमारे नेताओं में भी मिलते हैं।
इस तुलनात्‍मक अध्‍ययन से पहले यह जान लें कि गिद्धों में पाए जाने वाले सात आश्‍चर्यजनक गुण आखिर हैं कौन-कौन से:
1- गिद्ध सबसे ऊंची उड़ान भरने वाला पक्षी है. ये ऊंचाई एवरेस्ट (29,029 फीट) से काफ़ी अधिक है और इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी से ज़्यादातर दूसरे पक्षी मर जाते हैं।
2- जंगली जानवरों और इंसानी शवों को खाने वालों में गिद्ध का नंबर सबसे ऊपर आता है। दूसरे सभी जीव मिलकर कुल मृत पशुओं का सड़ा माँस और कंकाल मात्र 36 प्रतिशत ही खा पाते हैं जबकि गिद्ध अकेले बाकी 64 प्रतिशत को उदरस्‍थ कर जाते हैं।
3- गिद्ध अपने भोजन के लिए काफ़ी अधिक दूरी तय कर सकते हैं। प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी रूपेल्स वेंचर ने हाल में एक गिद्ध को तंजानिया स्थित अपने घोंसले से केन्या के रास्ते सूडान और ईथोपिया तक उड़ान भरते हुए कैमरे में क़ैद किया।
4- गिद्ध अपने पैरों पर पेशाब करते हैं और उनकी ये आदत आपको भले ही अच्छी न लगे, लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि उनकी इस आदत से उन्हें बीमारियों से बचने में मदद मिलती है।
5- गिद्ध एक सीध में करीब 1000 किलोमीटर तक की दूरी तय करने के लिए बिजली के विशाल खंभों का अनुसरण करते हैं।
6- ये सही है कि गिद्धों को सड़ा हुआ मांस और मृत पशुओं को खाने के लिए जाना जाता है, लेकिन गिद्ध केवल सड़ा हुआ मांस नहीं खाते। जैसा कि इनके नाम से ही ज़ाहिर होता है पाम नट वल्चर (गिद्ध) कई तरह के अखरोट, अंजीर, मछली और कभी-कभी दूसरे पक्षियों को भी खाते है. कंकालों के मुक़ाबले इसे कीड़े और ताजा मांस पसंद है।
7- गिद्ध दुनिया का एक मात्र ऐसा जीव है जो अपने भोजन में 70 से 90 प्रतिशत तक हड्डियों को शामिल कर सकता है और उनके पेट का अम्ल उन चीजों से भी पोषक तत्व ले सकता है, जिसे दूसरे जानवर छोड़ देते हैं।
गिद्धों के पेट का अम्ल इतना शक्तिशाली होता है कि वो हैजे और एंथ्रेक्स के जीवाणुओं को भी नष्ट कर सकता है जबकि दूसरी कई प्रजातियां इन जीवाणुओं के प्रहार से मर सकती हैं।
अब इत्तिफाक देखिए कि नेताओं की भी उड़ान असीमित होती है. शिकार के लिए वह किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश का नेता, तमिलनाडु जाकर चुनाव लड़ सकता है और महाराष्‍ट्र का नेता पंजाब में आकर ताल ठोक सकता है। बस जरूरत है तो इस बात की कि उसे वहां उसकी पसंद का शिकार यानि वोटर पर्याप्‍त मात्रा में मिल सके। ऑक्‍सीजन की कमी से गिद्ध नहीं मरता, और कोई नेता भी कभी आपने ऑक्‍सीजन की कमी से मरते हुए नहीं सुना होगा।
गिद्ध अकेले सड़े हुए मांस और कंकालों का 64 प्रतिशत हिस्‍सा खा जाते हैं, तो नेता भी देश का 64 प्रतिशत धन हड़प कर जाते हैं। नेताओं पर होने वाले देश के खर्च का हिसाब यदि सही-सही निकाला जाए तो निश्‍चित जानिए कि यह इतना ही बैठेगा। बाकी 36 प्रतिशत में देशभर के विकास कार्य सिमटे रहते हैं।
जहां तक बात है हाजमे की, तो नेताओं का हाजमा गिद्धों से अधिक न सही किंतु उनसे कम दुरुस्‍त नहीं होता। बल्‍कि कुछ मायनों में तो ज्‍यादा ही दुरुस्‍त पाया जाता है। जैसे कि गिद्ध केवल अपना पेट भरने तक ही खाते हैं लेकिन नेतागण खाने से कई गुना अधिक बचाकर भी रखते हैं ताकि उनकी भावी पीढ़ी का इंतजाम हो सके।
गिद्ध अपने पैरों पर पेशाब करके बीमारियों से बच निकलते हैं अर्थात उनके खुद के पास अपनी समस्‍याओं के समाधान का चमत्‍कारिक उपाय होता है, इसी प्रकार नेताओं के पास अपनी हर समस्‍या का अचूक इलाज होता है। कभी मीडिया के सिर तो कभी विरोधी दलों पर हड़िया फोड़कर नेता खुद को पाकसाफ घोषित कर देते हैं।
गिद्ध कई तरह के अखरोट, अंजीर, मछली और कभी-कभी दूसरे पक्षियों को भी खाते है. कहने का मतलब यह है कि सड़ा हुआ मांस और कंकाल उसकी पहली पसंद नहीं है। नेताओं की भी पहली पसंद ”सुस्‍वादु भ्रष्‍टाचार” है।
ऐसा भ्रष्‍टाचार जिसके लिए उन्‍हें बहुत कवायद न करनी पड़े। जोखिम उठाकर भ्रष्‍टाचार तो वह तब करते हैं जब पेट भरने लायक आसान भ्रष्‍टाचार उन्‍हें उपलब्‍ध नहीं होता।
फिलहाल, आसान भ्रष्‍टाचार के लिए हमारे नेतागण नगर निकाय चुनावों में हाथ आजमा रहे हैं। यही वह गिद्ध दृष्‍टि है जो जानती है कि एकबार किसी तरह जीत हासिल हो जाए, फिर पूरे पांच साल इतना खाने को मिलेगा कि पीढ़ियां तर जाएंगी।
यही कारण है कि लिखा-पढ़ी में धेले की आमदनी न होने के बावजूद लाखों रुपए खर्च करके वह घर-घर दस्‍तक दे रहे हैं।
आज अगर पूछा जाए तो उनसे बड़ा विकास पुरुष सारी दुनिया में कोई दूसरा चिराग लेकर ढूंढने से नहीं मिलेगा, किंतु जीतने के बाद विकास सिर्फ उनके घर तक सिमट कर रह जाएगा।
सच पूछा जाए तो वह बात भी अपने विकास की ही करते हैं, लेकिन जनता समझती है कि वह क्षेत्र के विकास की बात कर रहे हैं।
नेतागण ”आत्‍मा सुखी तो परमात्‍मा सुखी” जैसी कहावत में पूरा यकीन रखते हैं इसलिए वह पहले स्‍वयं को सुखी बनाने के उपाय करते हैं। इसके बाद किसी और की सोचते हैं। अब यदि इतने में पांच साल बीत जाएं तो इसमें नेताओं का क्‍या दोष ?
चुनाव लड़ने पर लाखों रुपए खर्च इसलिए नहीं किए जाते कि घर फूंककर तमाशा देखते रहें। उस खर्च की चक्रवर्ती ब्‍याज सहित भरपाई भी करनी होती है जिससे अगला चुनाव तिजोरी पर बोझ डाले बिना लड़ा जा सके।
जनता को सर्वाधिक बुद्धिमान और भाग्‍य विधाता घोषित करके पुदीने के पेड़ पर चढ़ा देने भर से यदि 64 प्रतिशत के गिद्धभोज में शामिल हुआ जा सकता है तो इसमें जाता क्‍या है।
इधर चुनाव संपन्‍न हुए नहीं कि उधर गिद्धभोज की तैयारियां शुरू हो जाएंगी। हर जिले में अलग-अलग मदों से गिद्धभोज के आयोजन होंगे किंतु मकसद सब जगह एक ही होगा।
बमुश्‍किल महीनेभर की मेहनत और फिर पांच साल तक हर तरह का बेरोकटोक गिद्धभोज। जिसके हिस्‍से में जो आ जाए। हाजमा इतना दुरुस्‍त है कि बोटी तो बोटी, हड्डियों को भी हजम करने में कोई दिक्‍कत नहीं आती।
सच पूछा जाए तो नेताओं में गिद्धों से भी ज्‍यादा गुण होते हैं। उनमें गीध दृष्‍टि के साथ-साथ बगुला की तरह ध्‍यानस्‍थ होने का अतिरिक्‍त गुण और होता है। वह पूरी एकाग्रता से शिकार का अंत तक इंतजार करते हैं।
संभवत: इसीलिए वोटर रूपी शिकार उनसे बच नहीं पता। कभी लोकसभा चुनाव हैं तो कभी विधानसभा। कभी नगर निकाय के चुनाव हैं तो कभी नगर पंचायत के। कभी जिला पंचायत है तो कभी प्रधानी के। हर समय कुछ न कुछ है। किसी में सीधे जनता को शिकार बनाया जाता है और किसी में उसके नाम पर शिकार किया जाता है।
गिद्ध की तरह गली-गली और मोहल्‍ले-मोहल्‍ले नेतागण बैठे हैं अपनी-अपनी पार्टियों की टोपी लगाए किसी ऐसे ऊंचे दरख्‍त की साख पर जहां से ”मृतप्राय: मतदाता” और उनकी मेहनत की कमाई को हजम किया जा सके।
इंतजार रहता है तो बस एक अदद चुनाव का, ताकि उसकी आड़ लेकर समाजसेवा का ढिंढोरा पीटा जा सके और उसके बाद ”आत्‍मा सुखी तो परमात्‍मा सुखी” जैसी कहावत पर पूरी तरह अमल किया जा सके।
फिलहाल निकाय चुनाव सामने हैं। साढ़े तीन साल बीत गए, बस डेढ़ बाकी हैं कि लोकसभा चुनावों की दुंदुभी बज उठेगी। गीधराज टोपी लगाए अब भी तैयार हैं और तब भी तैयार मिलेंगे। कहां तक बचोगे, वोट तो देना ही है।
गिद्धों का कोई विकल्‍प हो नहीं सकता। और किसी भी किस्‍म का गिद्ध हो, उसकी दृष्‍टि आपके मांस पर होगी ही।
तो जश्‍न मनाइए इस विकल्‍पहीनता का, और एकबार फिर वोट डालने जाइए 26 नवंबर को ताकि कल की नगरपालिका या आज के नगर निगम में गिद्धों के सामूहिक भोज को इस जुमले के साथ पूरे तटस्‍थभाव से निहारा जा सके कि ”कोऊ नृप होए, हमें का हानि”।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी