आज मुंशी प्रेमचंद की 137वीं जयंती पर विशेष: ‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’

हिंदी के महान लेखक मुंशी प्रेमचंद की 137वीं जयंती है. वह अपनी कहानियों और उपन्यासों के लिए जाने गए लेकिन राजनीतिक-सामाजिक विषयों पर उनके लेख आज भी प्रासंगिक कहे जा सकते हैं.
‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’ शीर्षक से यह आलेख प्रेमचंद ने जनवरी 1934 में लिखा था.
साम्प्रदायिकता और संस्कृति
साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है. उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है इसलिए वह उस गधे की भांति है जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रौब जमाता फिरता था.
हिन्दू अपनी संस्कृति को क़यामत तक सुरक्षित रखना चाहता है, मुसलमान अपनी संस्कृति को. दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गये हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति. अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति. मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं.
हालांकि संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं. आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है. हिन्दू मूर्तिपूजक हैं, तो क्या मुसलमान कब्रपूजक और स्थान पूजक नहीं हैं. ताज़िये को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है.
अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है तो हिन्दुओं में भी एक ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है. यहां तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता.
तो क्या भाषा का अन्तर है? बिल्कुल नहीं. मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें मगर मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत. हिन्दू या मुसलमान जिस प्रान्त में रहते हैं सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं, चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बंगला हो या मराठी.
बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू. दोनों एक ही भाषा बोलते हैं. सीमा प्रान्त का हिन्दू उसी तरह पश्तो बोलता है, जैसे वहां का मुसलमान.
फिर क्या पहनावे में अन्तर है? सीमा प्रान्त के हिन्दू और मुसलमान स्त्रियों की तरह कुरता और ओढ़नी पहनते-ओढ़ते हैं. हिन्दू पुरुष भी मुसलमानों की तरह कुलाह और पगड़ी बांधता है.
अक्सर दोनों ही दाढ़ी भी रखते हैं. बंगाल में जाइये, वहां हिन्दू और मुसलमान स्त्रियां दोनों ही साड़ी पहनती हैं, हिन्दू और मुसलमान पुरुष दोनों कुरता और धोती पहनते हैं. तहमद की प्रथा बहुत हाल में चली है, जब से साम्प्रदायिकता ने जोर पकड़ा है.
खान-पान को लीजिए. अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फ़ीसदी मांस खाते हैं. ऊंचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, ऊंचे दरजे के मुसलमान भी. नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते है, नीचे दरजे के मुसलमान भी.
मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं, जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है. मध्यवर्ग के मुसलमान भी बहुत कम शराब पीते है. हां, कुछ लोग अफ़ीम की पीनक अवश्य लेते हैं, मगर इस पीनकबाज़ी में हिन्दू भाई मुसलमानों से पीछे नहीं हैं.
हां, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं और उनका मांस खाते हैं, लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियां मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं, यहां तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालांकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अन्तर नहीं है. संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है. तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?
संगीत और चित्रकला भी संस्कृति का एक अंग है, लेकिन यहां भी हम कोई सांस्कृतिक भेद नहीं पाते. वही राग-रागनियां दोनों गाते हैं. फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना जोर बांध रही है.
वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड. शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं. यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं.
-BBC

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